50 करोड़ के इंटरनेशनल साइबर ठग गिरोह का किया सबसे बड़ा पर्दाफाश, फर्जी CSC से देशभर में बिछाया था ठगी का जाल…
आगरा। डिजिटल इंडिया की आड़ में लोगों की गाढ़ी कमाई लूटने वाले एक बेहद शातिर और संगठित अंतरराष्ट्रीय साइबर ठग गिरोह का आगरा पुलिस ने सनसनीखेज खुलासा किया है। यह गिरोह फर्जी कॉमन सर्विस सेंटर, नकली सरकारी वेबसाइट, फिशिंग लिंक और मोबाइल तैयार कर देशभर के लोगों को अपने जाल में फंसाता था। पीड़ित को सरकारी सेवा, केवाईसी अपडेट, योजना का लाभ, बैंक सत्यापन या दस्तावेज अपडेट का झांसा दिया जाता और जैसे ही वह लिंक पर क्लिक करता, साइबर ठग उसके मोबाइल और बैंकिंग जानकारी तक पहुंच बनाकर खाते से रकम साफ कर देते थे।
आगरा पुलिस की साइबर क्राइम टीम ने महीनों की तकनीकी जांच, डिजिटल ट्रैकिंग और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर इस हाईटेक साइबर नेटवर्क का भंडाफोड़ करते हुए दो शातिर आरोपियों को गिरफ्तार किया है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि यह गिरोह अब तक करीब 50 करोड़ रुपये की साइबर ठगी को अंजाम दे चुका है। पुलिस का कहना है कि यह केवल शुरुआती आंकड़ा है, जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, ठगी की रकम और बढ़ने की संभावना है।
पुलिस आयुक्त दीपक कुमार (आईपीएस) के निर्देशन में साइबर अपराधियों के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान के दौरान थाना साइबर क्राइम की टीम को इस नेटवर्क की जानकारी मिली। एक शिकायत के आधार पर शुरू हुई जांच ने ऐसा राज खोला जिसने जांच एजेंसियों को भी चौंका दिया। विवेचना में सामने आया कि आरोपी दूसरे लोगों के पहचान संबंधी दस्तावेजों का दुरुपयोग कर फर्जी कॉमन सर्विस सेंटर आईडी तैयार करते थे। इन्हीं आईडी के जरिए फर्जी वेबसाइट और मोबाइल एप बनाकर पूरे देश में साइबर ठगी का जाल फैलाया गया।
जांच में पता चला कि जैसे ही कोई व्यक्ति इन फर्जी वेबसाइटों या एप पर अपनी जानकारी दर्ज करता, उसका पूरा डेटा साइबर ठगों के कब्जे में पहुंच जाता था। इसके बाद बैंक खातों से अवैध तरीके से रकम निकाल ली जाती थी। कई पीड़ितों को तब तक इस ठगी का एहसास नहीं होता था, जब तक उनके मोबाइल पर खाते से पैसे निकलने का संदेश नहीं आ जाता था। पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह का नेटवर्क केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं था। इसके तार हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड सहित कई राज्यों से जुड़े मिले हैं, जबकि कुछ सदस्य विदेश में बैठकर पूरे साइबर रैकेट का संचालन कर रहे थे। विदेशी सर्वर और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर आरोपी अपनी पहचान छिपाते थे, जिससे उन्हें पकड़ना आसान नहीं था।
तकनीकी साक्ष्यों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस ने आरव वशिष्ठ उर्फ आशीष वशिष्ठ और रजत आहूजा को गिरफ्तार किया। दोनों के कब्जे से दो मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं। इन मोबाइलों की फॉरेंसिक जांच जारी है, जिससे गिरोह के अन्य सदस्यों, बैंक खातों, डिजिटल वॉलेट, फर्जी वेबसाइटों और विदेशी कनेक्शन से जुड़े कई बड़े खुलासे होने की उम्मीद है। पूछताछ में यह भी सामने आया कि गिरोह लगातार नई-नई फर्जी वेबसाइट और मोबाइल एप बनाकर लोगों को निशाना बनाता था। सरकारी योजनाओं, बैंकिंग सेवाओं और डिजिटल सुविधाओं के नाम पर भरोसा जीतकर लोगों की निजी और बैंकिंग जानकारी हासिल की जाती थी। पुलिस का मानना है कि इस गिरोह के शिकार लोगों की संख्या काफी अधिक हो सकती है।
गिरफ्तार आरोपी आरव वशिष्ठ के खिलाफ पहले से भी कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। पुलिस उसके पुराने नेटवर्क, साथियों और आर्थिक लेनदेन की भी जांच कर रही है। वहीं दूसरे आरोपी से पूछताछ के आधार पर कई नए नाम सामने आए हैं, जिनकी तलाश में पुलिस की टीमें लगातार दबिश दे रही हैं। साइबर क्राइम थाना अब गिरोह के बैंक खातों, डिजिटल वॉलेट, संदिग्ध ट्रांजैक्शन, मोबाइल नंबर, ई-मेल आईडी, आईपी एड्रेस और विदेशी कनेक्शन की गहराई से जांच कर रहा है। अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही इस अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट से जुड़े अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी कर पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश किया जाएगा।
प्रभारी पुलिस उपायुक्त पश्चिमी आदित्य कुमार ने बताया कि यह कार्रवाई साइबर अपराध के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की बड़ी सफलता है। गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं। डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर गिरोह के अन्य सदस्यों की पहचान की जा रही है और पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए लगातार कार्रवाई जारी है। उन्होंने आम नागरिकों से अपील की कि किसी भी अनजान लिंक, फर्जी वेबसाइट, मोबाइल एप या संदिग्ध कॉल पर भरोसा न करें और बैंकिंग जानकारी, ओटीपी अथवा पासवर्ड किसी के साथ साझा न करें। साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 हेल्पलाइन या नजदीकी साइबर थाने में शिकायत दर्ज कराएं।